TCE ऑटो डेस्क। भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी. अनंत नागेश्वरन ने पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण (E20) के प्रभाव को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विचारणीय टिप्पणी की है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि E20 पेट्रोल के इस्तेमाल से देश की पुरानी तकनीक वाली गाड़ियों को तकनीकी नुकसान पहुंच रहा है। पुराने दोपहिया वाहनों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए पेट्रोल पंपों पर E10 पेट्रोल (10% एथेनॉल मिश्रित ईंधन) की बिक्री दोबारा शुरू की जानी चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने आगाह किया है कि यदि भविष्य में एथेनॉल मिश्रण को 20 प्रतिशत से आगे 30 प्रतिशत तक ले जाया गया, तो देश में गंभीर खाद्य संकट, महंगाई और जल संकट उत्पन्न हो सकता है।
8 करोड़ पुरानी गाड़ियों के इंजन और पार्ट्स को खतरा
मुख्य आर्थिक सलाहकार के विश्लेषण के अनुसार, वर्तमान में देश की सड़कों पर करीब 8 करोड़ ऐसे पुराने बाइक और स्कूटर दौड़ रहे हैं जो BS-IV उत्सर्जन मानकों के लागू होने से पहले निर्मित हुए थे। ये सभी वाहन पुरानी 'कार्बोरेटर' तकनीक पर आधारित हैं और आधुनिक फ्यूल इंजेक्शन (FI) प्रणाली से लैस नहीं हैं।
समस्या की मुख्य वजह यह है कि सरकार अब देश भर में 20% एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (E20) की आपूर्ति तेजी से बढ़ा रही है, लेकिन पुराने कार्बोरेटर इंजन इस ईंधन को सही तरीके से स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं:
- इंजन का अत्यधिक गर्म होना (Overheating): एथेनॉल में ऑक्सीजन की मात्रा पारंपरिक पेट्रोल की तुलना में अधिक होती है। पुरानी कार्बोरेटर वाली गाड़ियां हवा और पेट्रोल के इस बदले हुए मिश्रण को स्वतः एडजस्ट (Auto-adjust) नहीं कर पाती हैं, जिसके परिणामस्वरूप इंजन अधिक गर्म होने लगता है और उसकी कार्यक्षमता घट जाती है।
- रबर और प्लास्टिक पार्ट्स का क्षरण: एथेनॉल एक संक्षारक (Corrosive) तत्व है। E20 पेट्रोल के निरंतर संपर्क में आने से पुराने वाहनों के फ्यूल टैंक, फ्यूल लाइन, रबर के होज पाइप और सील धीरे-धीरे गलने और कटने लगते हैं, जिससे लीकेज और ब्रेकडाउन का जोखिम बढ़ जाता है।
नागेश्वरन का सुझाव है कि जब तक इन 8 करोड़ पुराने वाहनों में तकनीकी रेट्रोफिटिंग या मॉडिफिकेशन की व्यवस्था नहीं हो जाती, तब तक ईंधन स्टेशनों पर E10 पेट्रोल का समानांतर विकल्प उपलब्ध कराया जाना चाहिए ताकि आम नागरिकों के वाहन सुरक्षित रह सकें।
खाद्य सुरक्षा, पोल्ट्री और डेयरी सेक्टर पर मंडराता संकट
रिपोर्ट में यह रेखांकित किया गया है कि यद्यपि पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने से कच्चे तेल के आयात बिल में कमी आई है और देश की भारी विदेशी मुद्रा बची है, लेकिन इसके दूरगामी दुष्प्रभाव कृषि और खाद्य क्षेत्र पर दिखने लगे हैं। एथेनॉल की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए गन्ना, मक्का और टूटे चावल (चावल के दाने) जैसी खाद्य फसलों को बड़े पैमाने पर डिस्टिलरीज में भेजा जा रहा है।
यदि एथेनॉल निर्माता कंपनियां किसानों से ज्यादा दाम देकर मक्के की बड़े पैमाने पर खरीद करेंगी, तो इससे पोल्ट्री (मुर्गी पालन) और डेयरी उद्योग के लिए पशु आहार और चारे की भारी कमी हो जाएगी। चारा महंगा होने से सीधे तौर पर दूध, चिकन और अंडों की कीमतों में भारी उछाल आएगा, जो खुदरा खाद्य महंगाई को अनियंत्रित कर सकता है।
चीनी का गणित और घटता भूजल स्तर
एथेनॉल उत्पादन का सीधा असर घरेलू चीनी भंडार और जल संसाधनों पर भी पड़ रहा है। चालू सीजन में देश के कुल वार्षिक उत्पादन का लगभग 10 प्रतिशत (करीब 30 लाख टन) चीनी का डायवर्जन एथेनॉल बनाने के लिए कर दिया गया। इसी कारण अब आने वाले समय में गन्ने के अत्यधिक डायवर्जन पर नियंत्रण लगाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है ताकि देश में चीनी के दाम नियंत्रित रहें।
इसके साथ ही पर्यावरण और जल संकट का पहलू भी अत्यंत गंभीर है। गन्ना एक ऐसी फसल है जिसे उगाने में सर्वाधिक भूजल की खपत होती है। आर्थिक सलाहकार का तर्क है कि हमें केवल एथेनॉल संयंत्रों में प्रयुक्त जल की गणना नहीं करनी चाहिए, बल्कि गन्ने की खेती में खर्च होने वाले अरबों लीटर भूजल का समग्र हिसाब भी लगाना होगा। जिस पानी से आम जनता की पेयजल और अन्य जरूरी सिंचाई आवश्यकताएं पूरी हो सकती थीं, उसका ईंधन में अत्यधिक उपयोग जल संकट को गहरा कर सकता है।
सरकार का रुख: E20 सुरक्षित, डुअल फ्यूल सप्लाई आसान नहीं
दूसरी ओर, सरकार एथेनॉल सम्मिश्रण कार्यक्रम को रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत सफल मानती है। सरकार का पक्ष है कि E20 नीति से विदेशी मुद्रा की ऐतिहासिक बचत हुई है और किसानों को उनकी फसलों का बेहतर और समय पर भुगतान मिला है। तकनीकी परीक्षणों के आधार पर सरकार का यह भी दावा रहा है कि आधुनिक वाहनों के इंजनों को E20 से कोई बड़ा नुकसान नहीं होता है।
इसके अलावा, पेट्रोल पंपों पर E10 और E20 दोनों प्रकार के पेट्रोल को एक साथ अलग-अलग नोजल से बेचने की मांग को लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन के अतिरिक्त खर्च के आधार पर पहले व्यावहारिक नहीं माना गया था।
भविष्य की राह: 20% के बाद जल्दबाजी से बचने की जरूरत
मुख्य आर्थिक सलाहकार का स्पष्ट मंतव्य है कि एथेनॉल मिश्रण योजना को बंद करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन 20 प्रतिशत से आगे बढ़ने से पहले बहुत सतर्कता और व्यापक अध्ययन जरूरी है। ऊर्जा सुरक्षा से प्राप्त होने वाले वित्तीय लाभ की तुलना हमेशा उन अप्रत्यक्ष नुकसानों से की जानी चाहिए जो कृषि क्षेत्र, खाद्य अर्थव्यवस्था और भूजल स्तर को उठाने पड़ सकते हैं। भारत को ईंधन उत्पादन के लिए अपनी उपजाऊ भूमि और जल संसाधनों के संतुलन को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. E20 पेट्रोल से पुरानी गाड़ियों को क्या नुकसान हो रहा है?
BS-IV से पहले की कार्बोरेटर वाली गाड़ियों में E20 पेट्रोल के इस्तेमाल से इंजन अधिक गर्म होता है और रबर पाइप तथा सील गलने का खतरा बना रहता है।
2. देश में कितने पुराने दोपहिया वाहन E20 से प्रभावित हो सकते हैं?
मुख्य आर्थिक सलाहकार के अनुसार देश में लगभग 8 करोड़ पुराने बाइक और स्कूटर चल रहे हैं जो पुरानी कार्बोरेटर तकनीक पर आधारित हैं।
3. क्या E10 पेट्रोल को दोबारा शुरू करने की मांग की गई है?
हां, मुख्य आर्थिक सलाहकार ने सुझाव दिया है कि पुरानी गाड़ियों की सुरक्षा के लिए पेट्रोल पंपों पर E10 पेट्रोल का विकल्प तब तक मिलना चाहिए जब तक इन गाड़ियों में सुधार न हो जाए।
4. एथेनॉल के अत्यधिक उत्पादन से खाद्य महंगाई कैसे बढ़ सकती है?
एथेनॉल के लिए मक्का, गन्ना और चावल का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने से पशु चारा और खाद्य आपूर्ति प्रभावित होगी, जिससे दूध, अंडे और चिकन की कीमतें बढ़ सकती हैं।
